17 मई 2020 - 18:46
न्यूयार्क टाइम्ज़ः सऊदी अरब के विशाल सपने कोरोना वायरस और मूल्यहीन तेल की दीवार से टकराकर चकनाचूर हो गए

अमरीका के न्यूयार्क टाइम्ज़ अख़बार ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें कोरोना वायरस और तेल की क़ीमतों में भारी गिरावट से सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को पहुंचने वाले गहरे आघात का जायज़ा लिया गया है।

इन दोनों गहरे ज़ख़्मों ने बिन सलमान की सारी सामाजिक और आर्थिक परियोजनाओं को बड़ी गहराई में डुबो दिया है। सपनों की बात तो अलग है सऊदी अरब के नागरिकों की रोज़ाना की ज़िंदगी सख़्त होकर रह गई है।

सऊदी अरब ने अपनी अधिकतर आबादी को काफ़ी सुविधाएं दे रखी थीं मगर अब तो भविष्य बिल्कुल बदला हुआ नज़र आ रहा है। बिन सलमान ने जो वादे किए थे उनके बारे में तो अब कोई सोचता भी नहीं।

मध्यपूर्व के मामलों के विशेषज्ञ माइकल स्टीवेन्सन जो लंदन के रायल फ़ाउंडेशन थिंक टैंक का हिस्सा हैं, कहते हैं कि बिन सलमान ने 2030 के नाम से जो महत्वाकांक्षी परियोजना बनाई थी वह अब दम तोड़ चुकी है।

सऊदी अरब इस समय अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर में है और इस कठिन दौर में देश की सत्ता बिन सलमान के हाथ में है। मगर यह नहीं लगता कि बिन सलमान नियोम नाम का औद्योगिक शहर बसाने जैसे अपने किसी भी कार्यक्रम से पीछे हटने के बारे में सोच रहे हैं। सऊदी वित्त मंत्री मुहम्मद अलजदआन ने कहा है कि बड़ी परियोजनाओं को ख़त्म नहीं केवल स्थगित किया जाएगा।

अब सऊदी अरब की नई पीढ़ी जब ख़ुद को सारी सुविधाओं से वंचित पाएगी तो सत्ता के साथ नागरिकों के संबंधों की शक्ल बदल जाएगी। पहले दौलत की भरमार थी आम नागरिक सुविधाओं, सस्ती बिजली और सस्ते ईंधन का प्रयोग करता था। शिक्षा और चिकित्सा सेवाएं मुफ़्त थीं और आरामदेह सरकारी नौकरियां होती थीं।

मगर अब हालात बदल चुके हैं। सरकार ने टैक्स बढ़ाने की घोषणा की है और महंगाई भत्ता कम कर देने का एलान किया गया है।

वाशिंग्टन स्थित परशियन गल्फ़ फ़ाउंडेशन नामक थिंक टैंक की टीकाकार क्रीस्टीन स्मिथ का कहना है कि अब बहुत सी चीज़ें आम नागरिकों के लिए मुफ़्त नहीं रहेंगी जो पहले मुफ़्त मिला करती थीं। अब सऊदी नागरिकों को यह संदेश दिया जा रहा है कि आप को देश की कठिनाइयों और दुखों में भी पूरी तरह हाथ बंटाना पड़ेगा।

स्टीवेन्सन का कहना है कि एक बिंदु बहुत अजीब है कि सऊदी अरब ने आर्थिक दुर्दशा के दौर में सबसे ज़्यादा बोझ आम नागरिकों पर डाला है।

स्रोतः न्यूयार्क टाइम्ज़